Tuesday, December 4, 2018

भाषा और संविधान

भाषा मात्र एक माध्यम है भावनाओं को व्यक्त करने का, सामने वाले व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने का। भाषा का कार्य सिर्फ इतना है कि किसी को अपनी बात को समझाया जा सके। भाषा की विविधता हमेशा से रही है लेकिन भाषा कभी भी अवरोधक नहीं बनी। इसको हम ऐसे देख सकते हैं कि आज तो विश्व भर में लगभग अधिकांश देशों में अंग्रेजी भाषा को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है जिससे व्यापार, नौकरी तथा अन्य किसी उद्देश्य के लिए कहीं भी मात्र अंग्रेजी भाषा के ज्ञान से आसानी से सभी कार्यों को अंजाम दे सकते हैं लेकिन पूर्व काल में जब अंग्रेजी भाषा सभी जगह व्याप्त नहीं थी तब भी देश विदेश में व्यापार होता था और बहुत सुचारू रूप से होता था।


वहीं भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ औसतन हर एक सौ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है, वहाँ भाषा का एक अलग ही सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्व होता है। भारत में भाषा की विविधता को ऐसे देख सकते हैं कि सन उन्नीस सौ इकसठ की जनगणना के अनुसार देश में कुल सौलह सौ बावन भारतीय भाषाएं थी। पीपुल्स भाषाई सर्वेक्षण (पीएलएसआई) ने दो हज़ार दस में भी सात सौ अस्सी भारतीय भाषाओं की गणना की।
सन उन्नीस सौ पचास में भारतीय संविधान में चौदह भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई थी। तदुपरांत कुछ भाषाओं की अधिक उपयोगिता को देखते हुए आठवीं अनुसूची में आठ और भाषाएं (सिंधी, कोकड़ी, नेपाली, मणिपुरी, मैथिली, डोंगरी, बोलो, संथाली) जोड़ी गई। इस प्रकार वर्तमान में भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या बाइस है। 

भाषाओं की विविधता के चलते देश में शासन संबंधी कार्यों के लिए भाषा का नियमन होना भी आवश्यक था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद तीन सौ तैंतालिस से तीन सौ इक्यावन में आधिकारिक भाषाओं के व्यवहार हेतु प्रावधान किये गये है। यह प्रावधान चार भागों में किया गया है: संघ की भाषा, क्षेत्रीय भाषा, कानून और न्याय तंत्र की भाषा और विशेष निर्देश। 


संघ की भाषा संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत संविधान के प्रारंभ यानी उन्नीस सौ पचास से अगले पंद्रह वर्षो अर्थात उन्नीस सौ पैंसठ तक आधिकारिक कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग हेतु प्रावधान किया गया। फिर उन्नीस सौ त्रेसठ में संसद द्वारा आधिकारिक भाषा अधिनियम पारित किया गया जिसमें आगे अनिश्चित समय के लिए अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में जारी रखने का प्रावधान किया गया। इस कानून में सन उन्नीस सौ सड़सठ में संशोधन किया गया जिसके अंतर्गत केंद्रीय सरकार द्वारा निर्गमित निर्देशो, प्रस्तावो, सामान्य निर्देशो, नियमनो, अधिसूचनाओ, प्रशासकीय सूचनाओ, अधिकारी कागजातो जो संसद के सामने रखे जाएं, ठेके, अनुबंधो, अनुज्ञप्तिओ, आज्ञा पत्रो आदि मामलों में अंग्रेजी और हिंदी का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया। हिंदी भाषा के प्रयोग में देवनागरी लिपि के अंतर्गत लिखी गई हिंदी को ही आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया परंतु अंको के आधिकारिक प्रयोग हेतु भारतीय अंकों के अंतराष्ट्रीय स्वरूप को ही स्वीकार किया गया, ना कि देवनागरी लिपि में लिखे गए अंको को।

क्षेत्रीय भाषा के संबंध में संविधान विभिन्न राज्यों की आधिकारिक भाषा के प्रयोग हेतु कुछ उल्लेखित नहीं करता। हां कुछ इसके संबंध में प्रावधान जरूर किए गए हैं, जैसे राज्य की विधान सभा द्वारा किसी एक या एक से अधिक भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया जा सकता है, केंद्र और राज्य के बीच अंग्रेजी को जोड़ने की भाषा का दर्जा दिया गया है, दो राज्य आपस में हिंदी भाषा के इस्तेमाल हेतु स्वतंत्र हैं, हिंदी और गैर-हिंदी राज्यों के बीच संवाद हेतु अंग्रेजी अनुवाद का प्रयोग होना चाहिए। यदि किसी राज्य की जनसंख्या की एक संतोषजनक संख्या उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को चाहती हैं तो राष्ट्रपति द्वारा उस भाषा को उस राज्य की पहचान के रूप में निर्देशित किया जाएगा। 


कानून और न्यायतंत्र की भाषा के संबंध में संविधान में प्रावधान किए गए हैं। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की कार्यवाही का अंग्रेजी में होना, केंद्रीय और राज्य स्तर के नियमों, अधिनियमो, संशोधनों, आदेशों, निर्देशों, कानूनों आदि के आधिकारिक पाठों का अंग्रेजी में होना, राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की सहमति के साथ उच्च न्यायालय में हिंदी या क्षेत्रीय भाषा की अनुमति प्रदान की जा सकती है लेकिन फैसले का अंग्रेजी में अनुवाद जरूर होना चाहिए, संसद के सामने पेश होने वाले विधायकों का हिंदी में अनुवाद अनिवार्य आदि प्रावधान शामिल है। 

विशेष निर्देशो के अंतर्गत  भारतीय संविधान कुछ भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा हेतु और हिंदी भाषा के विकास को बढ़ावा देने के लिए विशिष्ट निर्देशों को शामिल करता है, जैसे: नागरिकों को संघ और राज्य के अंतर्गत प्रयोग होने वाली किसी भी भाषा में विरोध पत्र दाखिल करने का अधिकार है, विशेष भाषाई बच्चे अपनी मातृभाषा में अपनी बात रख सकते हैं और राष्ट्रपति को भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त करना चाहिए आदि। 

भारत की विभिन्न भाषाओं का जिक्र हो और उसकी राष्ट्र भाषा से संबंधित भ्रांति की बात ना हो तो यह बेमानी होगी। असल में यह भ्रांति फैली हुई है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है लेकिन ऐसा है नहीं। संविधान द्वारा केंद्र को हिंदी भाषा के विकास को बढ़ावा देने हेतु जिम्मेदारी सौंपी गई जिसकी वजह से यह भारतीय संस्कृति की जन भाषा बन गई। राष्ट्रभाषा के तौर पर भारत में किसी एक भाषा को स्वीकार नहीं किया गया अपितु बाइस आधिकारिक भाषाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। 

Saturday, September 15, 2018

विकल्प अब ज़रूरत...

"आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।" मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही यह बात साबित होती आ रही है। जब-जब मनुष्य को किसी चीज की आवश्यकता महसूस हुई, तकनीकी स्तर पर मानव सभ्यता का विकास हुआ।
                     आज संपूर्ण विश्व भविष्य में होने वाले ऊर्जा संकट से अच्छी तरह वाकिफ़ है। चूँकि उर्जा के साधन सीमित ही हैं इसीलिए नित नए-नए खोज और अनुसंधान होते रहते हैं। ऊर्जा के तौर पर सबसे अधिक जीवाश्म ईंधन पर ही निर्भर किया जाता है।  जीवाश्म ईंधन से तात्पर्य धरती के गर्भ से प्राप्त जीवाश्म से प्राप्त होने वाले ईंधन से होता है जैसे- पेट्रोल, डीजल, कोयला आदि।
                     जीवाश्म ईंधन को प्राकृतिक रूप से बनने में सदियां लग जाती हैं। वहीं इसके विपरीत यदि इसी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से कुछ दिनों या घंटों में संपन्न कर लिया जाता है, तो उसे जैव ईंधन कहते हैं। जैव ईंधन मुख्यतः पौधों से बनाया जाता है।  जिससे बायो एथेनॉल, बायो डीज़ल और बायो सीएनजी प्राप्त होता है। जैव ईंधन के स्त्रोत के तौर पर एथेनॉल प्रमुख है, जो गन्ने के रस तथा चीनी वाली वस्तुएं जैसे- चुकंदर से प्राप्त होता है। इसी तरह बायो डीज़ल का उत्पादन जट्रोफा करकारा से होता है। जट्रोफा करकारा एक अखाद्य तेल उत्पादक झाड़ी है। जैव ईंधन की एक महत्वपूर्ण बात है कि यह पर्यावरण के अनुकूल ईंधन है। जैव ईंधन के उपयोग से अस्सी फीसदी तक कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जैव ईंधन का इस्तेमाल विमान उड़ाने में किया जा रहा है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) ने सत्र दो हज़ार पचास तक उड़ानों में पचास फीसदी तक कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य रखा है।
                      स्वच्छ ऊर्जा के रूप में जैव ईंधन के प्रयोग द्वारा भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सत्ताईस अगस्त को भारत में पहली बार जैव ईंधन के इस्तेमाल द्वारा स्पाइसजेट के एक विमान ने देहरादून से दिल्ली तक उड़ान भरी। यह भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल में पहला और महत्वपूर्ण कदम है।
                       केंद्र सरकार ने कुछ महीने पहले राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 को मंजूरी दी है।  इसके अंतर्गत जैव एथेनॉल, जैव डीज़ल, जैव सीएनजी तथा निगम के ठोस कचरे से प्राप्त इंधन को श्रेणीबद्ध किया गया है। चीनी उत्पादन वाली वस्तुएं जैसे-गन्ने का रस व चुकंदर, स्टॉर्च वाली वस्तुएं जैसे-मक्का, अनुपयुक्त अनाज जैसे-खराब गेंहूँ, टूटा चावल, सड़े हुए आलू तथा ज्वार के डंठल के इस्तेमाल की अनुमति देकर एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल का दायरा बढ़ाया है। अखाद्य तेल जैसे- जट्रोफा करकारा, करंज तथा इस्तेमाल किए जा चुके खाना पकाने के तेल से जैव डीज़ल उत्पादन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करके प्रोत्साहन दिया है। नीति को जमीनी स्तर पर अच्छी तरह से लागू करने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। जिसमें अगले चार साल में एथेनॉल का उत्पादन तीन गुना करने, आयात में बारह हज़ार करोड रुपए की कमी करने तथा सत्र दो हज़ार तीस तक पेट्रोल में बीस फीसदी तक एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य प्रमुख हैं।
                      भारत के संदर्भ में जैव ईंधन बहुत अधिक महत्व रखता है क्योंकि वर्तमान में भारत अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए बयासी फ़ीसदी कच्चा तेल तथा चवालीस फ़ीसदी प्राकृतिक गैस आयात पर निर्भर करता है। जैव ईंधन को बढ़ावा देने से न सिर्फ मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा मिलेगा बल्कि भारत सरकार के किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में भी मदद मिलेगी। जैव ईंधन की अवधारणा आज की नहीं है बल्कि तब से है जब हेनरी फॉरवर्ड द्वारा पहली कार का आविष्कार किया गया था।  परंतु आसानी से प्राप्त होने वाले जीवाश्म ईंधन के सामने इसको आगे नहीं बढ़ाया गया। वर्तमान परिस्थिति में जब संपूर्ण विश्व निकट भविष्य में होने वाले ऊर्जा संकट के बारे में सोच रहा है। ऐसे में जैव ईंधन का उपयोग क्रांति साबित हो सकता है। जैव ईंधन को अभी तक वैकल्पिक ईंधन के तौर पर देखा जाता रहा है लेकिन ऊर्जा संकट को देखते हुए जैव ईंधन के क्षेत्र में विकल्प स्तर पर नहीं ज़रूरत के स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है।

Saturday, September 8, 2018

आरक्षण: जनता से अधिक नेताओं की ज़रुरत



यूँ तो आरक्षण का जन्म पिछड़े वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए हुआ था, पर वर्तमान राजनीति के परिवेश को देख कर लगता है कि आरक्षण का जन्म असल में वोट बैंक और जातिवाद की राजनीति के लिए हुआ था। इसके वर्तमान उदाहरण के तौर पर बीस मार्च को उच्चतम न्यायालय के एससी-एसटी एक्ट में दिए गए फैसले को देख सकते हैं। फैसले के बाद सत्तारूढ़ पार्टी ने बिना किसी देरी के एससी-एसटी एक्ट में तुरंत संशोधन करके संसद में बिल पेश कर दिया। मज़े की बात देखिए कि विपक्ष के विरोध के कारण न जाने कितने ही बिल जो देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण होते हैं कई-कई सत्रों तक अटके रहते हैं, उस विपक्ष ने भी बिना किसी आपत्ति के सर्वसम्मति से इस बिल पर तुरंत ही मोहर लगा दी।
                   सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा एससी-एसटी एक्ट के संशोधन बिल पास करने के पश्चात पूरे देश के सवर्णों में उबाल की स्थिति बन गई है। सवर्ण समुदाय विरोध को लेकर सड़कों पर उतर आया है। इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सवर्ण अग्रणीय है।


अब राजनीति की पराकाष्ठा देखिए कि एससी-एसटी के नाम पर आज तक सवर्णों को भला बुरा कहते आए दलितों के नेता आज रुख देखकर सवर्णों को गोद लेने के लिए लाइन में खड़े हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती, लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान जो मुख्यतः दलितों के नाम पर राजनीति करते आए हैं, आज उनका कहना है कि आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण की श्रेणी में लाना चाहिए। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने तो यहां तक कह दिया है कि उच्चतम न्यायालय के अनुसार पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो हमें संविधान में संशोधन करके इसको पिचहत्तर प्रतिशत कर देना चाहिए और आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण की श्रेणी में लाना चाहिए।
                  अब सवाल यह उठता है कि अगर पिचहत्तर प्रतिशत आरक्षण कर दिया जाए तो फिर आरक्षण के बाहर बचेगा ही क्या! जरा सोचिए, क्या सच में किसी नेता या राजनीतिक पार्टी को किसी पिछड़े समाज से हमदर्दी है या यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति मात्र है! जहां तक आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण की श्रेणी में लाने के प्रावधान की बात है तो यह तो अभी संभव नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है ना कि आर्थिक पिछड़ापन। 

Friday, September 7, 2018

कानून बदला अब सोच की बारी...

एक तरफ जहां भारतीय संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के तहत नागरिकों के जीने के अधिकार के अंतर्गत निजता का अधिकार प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ सतहत्तर इसकी विरोधाभासी रही है। बृहस्पतिवार को दिए गए अपने फैसले में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करके उच्चतम न्यायालय ने न सिर्फ इस विरोधाभास को समाप्त किया बल्कि देश के एलजीबीटी समुदाय को मौलिक मानवाधिकार दिलाया है। अपने फैंसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यौन प्राथमिकता जैविक और प्राकृतिक है। यह पूर्णता एक निजी चुनाव है। इसमें किसी भी प्रकार का दखल मौलिक अधिकारों का हनन है और धारा तीन सौ सतहत्तर इसका हनन करती है अतः इस को आंशिक रूप से ख़ारिज किया जाता है।



अब प्रश्न यह है कि समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद इसको सामाजिक मान्यता कब तक मिल पाएगी! उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही जहां एक ओर एलजीबीटी कार्यकर्ताओं व समुदाय, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने इसका स्वागत किया वहीं दूसरी ओर धर्म और समाज के कुछ ठेकेदारों को एक बार फिर से चर्चा का एक ज्वलंत मुद्दा मिल गया है। उनका तर्क है कि यह भारतीय समाज के अनुकूल ही नहीं है। 
                भारतीय समाज में अभी भी कुछ लोगों की ऐसी सोच जिंदा है, जो समलैंगिकता को एक बीमारी की तरह सोचते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सभी रेल या बस में जाते हुए दीवारों पर विज्ञापन देखते हैं, जिसमें लिखा होता है, "सेक्स रोगी मिले, सेक्स की हर समस्या का समाधान किया जाता है।"  उसमें समलैंगिकता को भी सेक्स बीमारी के रूप में बताया जाता है। वहीं कुछ लोगों को लगता है कि जो लड़कियां हमेशा लड़कियों के साथ रहती हैं, वह लेस्बियन हो जाती है और जो लड़के अधिकांश्तः हॉस्टल में लड़कों के साथ रहते हैं, वह गे हो जाते हैं।
                दरअसल भारत में शिक्षा का स्तर बहुत कम होने की वजह से इस तरह की सोच संबंधी परेशानियां सामने आती है। यही वजह है कि समाज के नजरिये में जल्दी बदलाव की संभावना क्षीण ही नजर आती है। समलैंगिक संबंधों में कानून संबंधी समस्या के समाप्त होने के बावजूद भी इसको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए समाज में अलग-अलग माध्यमों से जागरूकता फैलाना आवश्यक है। समाज में किसी भी तरह की जागरूकता लाने के लिए सिनेमा एक उचित, शीघ्र और व्यापक माध्यम होता है। उन्नीस सौ अट्ठानवे में दीपा मेहता द्वारा बनाई गई फिल्म "फायर" से लेकर 2016 में आई करण जौहर निर्मित "कपूर एंड संस" तक समलैंगिकता पर भारत में अभी तक लगभग 10 से ज्यादा फिल्में बनाई जा चुकी हैं। भारतीय सिनेमा जगत ने समलैंगिकता के संबंध में जागरूकता फैलाने में पूर्ण तरह से योगदान किया है। बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही फिल्म निर्माता करण जौहर और एक्टर अनिल कपूर द्वारा ट्वीट के ज़रिए दी गई तुरंत प्रतिक्रियायें इसका वर्तमान उदाहरण है।



अंततः सिर्फ कानून बदलने से ही तस्वीर नहीं बदलने वाली सोच को बदलना भी उतना ही जरूरी है। 

Thursday, August 23, 2018

भारतीय हॉकी (आरम्भ से वर्तमान तक)





भारत में हॉकी हमेशा से बहुत प्रिय खेल रहा है। भारत में हॉकी को पसंद किये जाने की सबसे बड़ी वजह हॉकी खेल के उदय के समय भारतीय खिलाड़ियों का उत्कृष्ट प्रदर्शन रही है। भारत में हॉकी के प्रति लगाव का अंदाज़ इस बात से भी लगाया जा सकता है कि आधिकारिक रूप से किसी पुष्टि के बगैर ही हॉकी को एक लम्बे समय तक भारत का राष्ट्रीय खेल माना जाता रहा।
      हॉकी खेल 19वीं सदी में अंग्रेजी द्धीप में विकसित हुआ था। सर्वप्रथम यह ब्रिटिश विश्वविद्दालयो में खेला जाता था। भारत में यह ब्रिटिश सेना के द्वारा लाया गया। भारत में सबसे पहले हॉकी क्लब की स्थापना सत्र 1885-86 में कलकत्ता में हुई थी। अंतराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी की शुरुआत सत्र 1924 में अंतराष्ट्रीय हॉकी महासंघ के गठन के साथ हुई। 
      सत्र 1928 में भारतीय हॉकी टीम अंतराष्ट्रीय हॉकी महासंघ की पहली गैर-यूरोपीय सदस्य टीम बनी। 1928 में ही टीम ने एम्स्टर्डम ओलंपिक में पहली बार भाग लिया और अपने पहले ओलंपिक में ही पहला स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया जयपाल सिंह की कप्तानी में भारतीय टीम ने इस ओलंपिक में कुल 5 मैच खेले और पाँचो मैचों में शानदार 29 गोल दागे भारतीय हॉकी टीम की इस अदभुत उपलब्धी के कारण सम्पूर्ण विश्व के खेल जगत का ध्यान भारतीय हॉकी टीम की ओर आकर्षित हो गया। 

पहले ओलंपिक में टीम का प्रदर्शन इस प्रकार रहा:

पहले मैच में भारत ने ऑस्ट्रिया को 6-0 से शिकस्त दी।  (ध्यानचंद 4, शौकत अली 1, मौरिस 1 )

दूसरे मैच में भारत ने बेल्जियम को 9-0 से हराया।(फ़िरोज़ खान 5, फेड्रिक सीमैन 2, जॉर्ज मार्थिनस 1, ध्यानचंद 1)

तीसरे मैच में भारत ने डेनमार्क को 5-0 से मात दी।(ध्यानचंद 4, फेड्रिक सीमैन 1)

चौथे मैच में भारत ने स्विट्ज़रलैंड को 6-0 से हराया।(ध्यानचंद 3, मौरिस 2, जॉर्ज मार्थिनस 1)

फाइनल मुकाबला भारत ने हॉलैंड के खिलाफ 3-0 से जीता।(ध्यानचंद 2, जॉर्ज मार्थिनस 1)


 
इसके बाद भारतीय टीम ने एक लम्बे समय तक पीछे मुड़के नहीं देखा। सत्र 1928 से लेकर 1956 तक भारतीय हॉकी टीम नाबाद रही और टीम ने लगातार 6 ओलंपिको में 6 स्वर्ण पदक जीते। इस काल को भारतीय हॉकी टीम का स्वर्णिम काल कहा जाता है। इस स्वर्णिम काल में भारतीय टीम ने 24 मैच खेले और सभी 24 मैचों में शानदार जीत दर्ज की। इन मैचों में भारतीय टीम ने कुल 178 गोल दागे और सिर्फ 7 गोल छोड़े
भारतीय हॉकी टीम ने सत्र 1928, 1932, 1936, 1948, 1952, और 1956 में तो खिताब जीते ही साथ ही 1964 और 1980 में भी ओलंपिक विजेता बनने में सफल रही। इसके अलावा भारतीय टीम 1960 में रजत पदक विजेता और 1968 व 1972 में कांस्य पदक विजेता भी रही। 
       सत्र 1971 में हॉकी विश्व कप की शुरुआत हुई इसमें भारतीय टीम ने औसत प्रदर्शन किया और तीसरा स्थान दर्ज किया। 1973 में फाइनल मुकाबला हार जाने के कारण उपविजेता बनकर ही संतुष्ट रहना पड़ा। अन्ततः 1975 में भारतीय टीम विश्वविजेता बनने में सफल रही। 

1975 world cup winning team
भारत को एक चैंपियन टीम बनाने में जिस खिलाडी का सबसे अहम योगदान रहा था, वो खिलाड़ी थे भारत में खेलो के पितामह माने जाने वाले मेजर ध्यानचंद जी। अगर मै कहूँ कि भारतीय हॉकी और उसका इतिहास बिना मेजर ध्यानचंद के अधूरा है तो ये अतिश्योक्ति न होगी। दद्दा के नाम से मशहूर मेजर ध्यानचंद ने अपनी खेल प्रतिभा से भारतीय हॉकी को दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाया। उनका काल भारतीय हॉकी का स्वर्णिम काल था।  इस काल में भारतीय टीम से पार पाना आसान नहीं था। मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता है। उनको हॉकी का जादूगर कहे जाने के पीछे यह कारण था कि उनकी स्टिक से गेंद ऐसे चिपक जाती थी जैसे किसी लोहे से चुम्बक चिपक जाती है। हॉकी के जादूगर के खेल का प्रभाव कुछ इस कदर था कि उसके कारण ही न सिर्फ भारतीय हॉकी को बल्कि सम्पूर्ण भारतीय खेल जगत को एक नया अंतराष्ट्रीय मुकाम हासिल हुआ। भारतीय खेल जगत के इस सबसे बड़े खिलाडी ने हिटलर तक को अपना फैन बना लिया था। उनको डॉन ब्रेडमैन और पेले के साथ दुनिया के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है। उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। भारतीय ओलम्पिक संघ ने मेजर ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाडी घोषित किया था। उनके भारतीय खेल जगत में अमूल्य योगदान के कारण ही उनके जन्मदिवस 29 अगस्त को भारतीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। फिलहाल ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग की जा रही है। 
Hockey ke jaadugar: Major Dhyanchand

Hockey ke jaadugar: Major Dhyanchand
यूरोप से शुरू हुए इस खेल में वो ऐसा समय था जब हॉकी को एशियाई देशो का ही खेल माना जाने लगा। एशियाई टीम भारत और पाकिस्तान का इस खेल में सबसे अधिक वर्चस्व रहा था। लेकिन नब्बे का दशक आते आते हॉकी में ऐस्ट्रो टर्फ का आगमन हो गया। (यहाँ बताते चले की ऐस्ट्रो टर्फ एक विशेष प्रकार की बनावटी घास से तैयार किया गया खेल का पिच होता है) ऐस्ट्रो टर्फ के हॉकी में आ जाने से एक तरह से इस खेल की जैसे तस्वीर ही बदल गयी। जहां एस्ट्रो टर्फ आने से पूर्व नियंत्रण के साथ क्लासिक हॉकी खेलने वाले खिलाड़ियों और देशों का दबदबा रहता था, वहीं इसके आने के बाद तेज हॉकी खेले जाने लगी और नियंत्रण के बजाय तेजी से खेलने वाले खिलाड़ियों तथा देशों का दबदबा बढ़ने लगा। इसी कारण समय बीतने के साथ-साथ कलात्मक हॉकी खेलने वाले भारतीय खिलाड़ियों की चमक फीकी पड़ने लगी। इससे न सिर्फ यूरोप ने इस खेल में पुनः अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं, बल्कि दूसरे महाद्वीपों की टीमों ने भी इस खेल में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। नब्बे के दशक के बाद तो भारतीय टीम की हालत और भी पतली हो गई। भारतीय टीम चैम्पियन टीम से फिसड्डी टीम बनकर रह गईं।

Astro turf field
classic field



उसके बाद से भारतीय हॉकी टीम के प्रदर्शन की बात करे तो निराशा ही ज्यादा मिलती है। उसका हाल कुछ धूप-छाँव जैसा रहा है जिसमे भी हार की कड़ी धूप अधिक मिलती है और जीत की छाँव कम। 1989 में धनराज पिल्लै ने भारतीय हॉकी टीम ने अपने करियर की शुरुआत की। उनके कुछ उत्कृष्ट प्रदर्शनो को देखते हुए भारतीय हॉकी प्रेमियों में एक बार फिर अपने प्रिय खेल के प्रति उत्साह जागृत होने लगा। धनराज पिल्लै एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने 4 ओलंपिक, 4 विश्वकप और 4 चैंपियंस ट्रॉफी और 4 एशियाई खेलों में भाग लिया है। उन्होंने कुल 339 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले अपने पूरे करियर में उन्होंने 170 से ज्यादा गोल दागे लेकिन एक टीम जब तक मिलकर प्रदर्शन ना करें तब तक एक खिलाड़ी के भरोसे जीत हासिल नहीं की जा सकती। यही एक बड़ी परेशानी रही धनराज पिल्लै के करियर जीवन में। हालांकि उनकी कप्तानी में खेलते हुए भारतीय हॉकी टीम ने एशियाई खेल 1998 में स्वर्ण पदक जीता और एशिया कप 2003 में जीत हासिल की। उन्होंने बैंकॉक एशियाई खेल खेलों में सर्वाधिक गोल दागे थे।

Dhanraj Pillay


2003 Asia cup winning team



2007 में भारतीय हॉकी में एक बार फिर खुशी की लहर दौड़ पड़ी। 2007 एशिया कप में भारत ने शानदार जीत दर्ज की। 
2007 Asia cup winning team



लेकिन भारतीय हॉकी प्रेमी इस जीत को ज्यादा दिन तक नहीं मना सके। 2008 में भारतीय हॉकी का वह काला दिन भी आया जिसमें लगातार छह बार ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता भारतीय टीम ओलंपिक में खेलने के लिए क्वालीफाई भी ना कर पाई। यह भारतीय टीम का सबसे खराब दौर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। 
2008 india hockey team failed to qualify for olympic games 



भारतीय हॉकी टीम के इतिहास में कभी प्रतिभावान खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं रही। सन 2004 में ऐसे ही एक खिलाड़ी संदीप सिंह ने अपने हॉकी करियर की शुरुआत की। 2009 में संदीप सिंह को भारतीय हॉकी टीम का कप्तान नियुक्त किया गया। उनकी कप्तानी में भारत में अजलन शाह कप 2009 का खिताब जीता, यह भारत की सुल्तान अजलान शाह हॉकी में 13 साल बाद पहली जीत थी। हॉकी में अपनी विशेष उपलब्धियों के कारण भारत सरकार ने उन्हें सन 2010 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। 
संदीप सिंह के खेल जीवन से प्रभावित होकर एक फिल्म निर्माता शाद अली ने संदीप सिंह के जीवन पर सूरमा नाम की एक फिल्म बनाई। इसे 13 जुलाई 2018 को रिलीज किया गया। 

sandeep singh


2006 में अपने अंतरराष्ट्रीय हॉकी करियर का शुरुआत करने वाले सरदार सिंह का नाम हॉकी के प्रमुख खिलाड़ियों में गिना जाता है। 2008 के अजलन शाह टूर्नामेंट में पहली बार टीम का नेतृत्व कर के देश के सबसे युवा हॉकी कप्तान बने। भारत सरकार ने 2012 में सरदार सिंह को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। सरदार सिंह की कप्तानी में एशियाई खेल 2014 में भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक हासिल किया। 

2014 asian games winning team



2017 में हुए एशिया कप हॉकी चैंपियनशिप में भारत ने एक बार फिर 10 साल का सूखा खत्म करके शानदार जीत दर्ज की भारत की। एशिया कप में तीसरी बार जीती। इससे पहले 2003 और 2007 और अब 2017 में भारत ने एशिया कप अपने नाम किया और एक बार फिर भारत के हॉकी प्रेमियों को एक खुशी का मौका दिया। 

2017 Asia cup winning team
2017 asia cup winning team














इंडोनेशिया में 18 अगस्त से शुरू हुए एशियन गेम्स में भारतीय हॉकी टीम ने अभी तक बहुत शानदार प्रदर्शन किया है। कोच हरेंद्र सिंह की कोचिंग और श्रीजी रविचंद्रन की कप्तानी में  भारतीय टीम ने अपने पहले मुकाबले में इंडोनेशिया को एकतरफा मुकाबले में 17-0 से हराकर बड़ी जीत दर्ज की है। वही पूल बी के अपने दूसरे मैच में हांगकांग को 26-0 से रौंदकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी में अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। भारत ने इस दौरान अपने सबसे बड़ी जीत के 86 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ा है जो उसने अमेरिका को ओलंपिक में 241 से हराया था। भारतीय हॉकी टीम के इस शानदार प्रदर्शन को देखते हुए भारतीय हॉकी प्रेमियों को 2018 के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने की एक बार फिर से आस जग गई है। 
india vs hongkong in asian games 2018
india vs indonesia in asian games 2018





1980 से लेकर 2018 तक भारतीय हॉकी टीम का ग्राफ चढ़ता उतरता रहा है। कभी भारतीय टीम ने जीत का स्वाद चखा तो कभी हार के कड़वे स्वाद को भी अनुभव किया। लेकिन इसका विश्लेषण करें तो जीत का स्वाद से ज्यादा हार के कड़वे अनुभव को स्वीकार करना पड़ा। यह बात माननीय है कि भारतीय हॉकी टीम में कभी भी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कमी नहीं रही है लेकिन फिर भी अपना एक स्वर्णिम काल स्थापित करने वाली भारतीय हॉकी टीम के लिए यह ग्राफ संतोषजनक नहीं हो सकता। आखिर भारतीय हॉकी टीम की ऐसी दुर्दशा क्यों है? यदि इसका विश्लेषण करें तो हमें भारतीय हॉकी टीम की जो कमजोरियां नजर आती हैं, उनमें एक सबसे बड़ी कमजोरी पेनल्टी कॉर्नर को गोल में कन्वर्ट ना कर पाने की रही है। हाल ही के कुछ सालों में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जब भारत ने जीते हुए यात्रा की ओर जाते हुए मैच अंतिम क्षणों में गोल खाकर हाथ से निकाल दिया है। भारतीय हॉकी की एक और समस्या रही है, वह अच्छे खिलाड़ियों की उपेक्षा। हॉकी के तेंदुलकर कहे जाने वाले धनराज पिल्ले हो, जगबीर सिंह या जोगराज सिंह। इन जैसे न जाने कितने ही प्रतिभाशाली खिलाड़ी हुए हैं जिनकी हॉकी फेडरेशन ने उपेक्षा की है, उन्हें उचित अवसर प्रदान नहीं किए गए हैं। इसके अलावा अन्य खेलों की ही तरह नेताओं और नौकरशाहों के दखल के चलते हुए हॉकी का बेड़ा गर्क हुआ है। यदि भारतीय हॉकी टीम को उसका पुराना मुकाम हासिल करना है तो उसे अपनी कमजोरियों से पार पाना होगा। खासतौर पर अंतिम क्षणों में शिथिलता को त्याग कर अपना नियंत्रण बनाए रखना होगा। अपनी इन कमजोर कड़ियों से पार पा कर ही हम हॉकी में अपने सुनहरे इतिहास को दोहरा पाएंगे।

hyperlinks: https://www.thehindu.com/sport/hockey/1928-olympics-indias-first-step-towards-ascending-hockey-throne/article3613550.ece


https://www.culturalindia.net/national-symbols/national-game.html


                                                                         -Priyank Bishnoi