Saturday, September 15, 2018

विकल्प अब ज़रूरत...

"आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।" मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही यह बात साबित होती आ रही है। जब-जब मनुष्य को किसी चीज की आवश्यकता महसूस हुई, तकनीकी स्तर पर मानव सभ्यता का विकास हुआ।
                     आज संपूर्ण विश्व भविष्य में होने वाले ऊर्जा संकट से अच्छी तरह वाकिफ़ है। चूँकि उर्जा के साधन सीमित ही हैं इसीलिए नित नए-नए खोज और अनुसंधान होते रहते हैं। ऊर्जा के तौर पर सबसे अधिक जीवाश्म ईंधन पर ही निर्भर किया जाता है।  जीवाश्म ईंधन से तात्पर्य धरती के गर्भ से प्राप्त जीवाश्म से प्राप्त होने वाले ईंधन से होता है जैसे- पेट्रोल, डीजल, कोयला आदि।
                     जीवाश्म ईंधन को प्राकृतिक रूप से बनने में सदियां लग जाती हैं। वहीं इसके विपरीत यदि इसी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से कुछ दिनों या घंटों में संपन्न कर लिया जाता है, तो उसे जैव ईंधन कहते हैं। जैव ईंधन मुख्यतः पौधों से बनाया जाता है।  जिससे बायो एथेनॉल, बायो डीज़ल और बायो सीएनजी प्राप्त होता है। जैव ईंधन के स्त्रोत के तौर पर एथेनॉल प्रमुख है, जो गन्ने के रस तथा चीनी वाली वस्तुएं जैसे- चुकंदर से प्राप्त होता है। इसी तरह बायो डीज़ल का उत्पादन जट्रोफा करकारा से होता है। जट्रोफा करकारा एक अखाद्य तेल उत्पादक झाड़ी है। जैव ईंधन की एक महत्वपूर्ण बात है कि यह पर्यावरण के अनुकूल ईंधन है। जैव ईंधन के उपयोग से अस्सी फीसदी तक कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जैव ईंधन का इस्तेमाल विमान उड़ाने में किया जा रहा है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) ने सत्र दो हज़ार पचास तक उड़ानों में पचास फीसदी तक कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य रखा है।
                      स्वच्छ ऊर्जा के रूप में जैव ईंधन के प्रयोग द्वारा भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सत्ताईस अगस्त को भारत में पहली बार जैव ईंधन के इस्तेमाल द्वारा स्पाइसजेट के एक विमान ने देहरादून से दिल्ली तक उड़ान भरी। यह भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल में पहला और महत्वपूर्ण कदम है।
                       केंद्र सरकार ने कुछ महीने पहले राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 को मंजूरी दी है।  इसके अंतर्गत जैव एथेनॉल, जैव डीज़ल, जैव सीएनजी तथा निगम के ठोस कचरे से प्राप्त इंधन को श्रेणीबद्ध किया गया है। चीनी उत्पादन वाली वस्तुएं जैसे-गन्ने का रस व चुकंदर, स्टॉर्च वाली वस्तुएं जैसे-मक्का, अनुपयुक्त अनाज जैसे-खराब गेंहूँ, टूटा चावल, सड़े हुए आलू तथा ज्वार के डंठल के इस्तेमाल की अनुमति देकर एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल का दायरा बढ़ाया है। अखाद्य तेल जैसे- जट्रोफा करकारा, करंज तथा इस्तेमाल किए जा चुके खाना पकाने के तेल से जैव डीज़ल उत्पादन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करके प्रोत्साहन दिया है। नीति को जमीनी स्तर पर अच्छी तरह से लागू करने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। जिसमें अगले चार साल में एथेनॉल का उत्पादन तीन गुना करने, आयात में बारह हज़ार करोड रुपए की कमी करने तथा सत्र दो हज़ार तीस तक पेट्रोल में बीस फीसदी तक एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य प्रमुख हैं।
                      भारत के संदर्भ में जैव ईंधन बहुत अधिक महत्व रखता है क्योंकि वर्तमान में भारत अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए बयासी फ़ीसदी कच्चा तेल तथा चवालीस फ़ीसदी प्राकृतिक गैस आयात पर निर्भर करता है। जैव ईंधन को बढ़ावा देने से न सिर्फ मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा मिलेगा बल्कि भारत सरकार के किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में भी मदद मिलेगी। जैव ईंधन की अवधारणा आज की नहीं है बल्कि तब से है जब हेनरी फॉरवर्ड द्वारा पहली कार का आविष्कार किया गया था।  परंतु आसानी से प्राप्त होने वाले जीवाश्म ईंधन के सामने इसको आगे नहीं बढ़ाया गया। वर्तमान परिस्थिति में जब संपूर्ण विश्व निकट भविष्य में होने वाले ऊर्जा संकट के बारे में सोच रहा है। ऐसे में जैव ईंधन का उपयोग क्रांति साबित हो सकता है। जैव ईंधन को अभी तक वैकल्पिक ईंधन के तौर पर देखा जाता रहा है लेकिन ऊर्जा संकट को देखते हुए जैव ईंधन के क्षेत्र में विकल्प स्तर पर नहीं ज़रूरत के स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है।

Saturday, September 8, 2018

आरक्षण: जनता से अधिक नेताओं की ज़रुरत



यूँ तो आरक्षण का जन्म पिछड़े वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए हुआ था, पर वर्तमान राजनीति के परिवेश को देख कर लगता है कि आरक्षण का जन्म असल में वोट बैंक और जातिवाद की राजनीति के लिए हुआ था। इसके वर्तमान उदाहरण के तौर पर बीस मार्च को उच्चतम न्यायालय के एससी-एसटी एक्ट में दिए गए फैसले को देख सकते हैं। फैसले के बाद सत्तारूढ़ पार्टी ने बिना किसी देरी के एससी-एसटी एक्ट में तुरंत संशोधन करके संसद में बिल पेश कर दिया। मज़े की बात देखिए कि विपक्ष के विरोध के कारण न जाने कितने ही बिल जो देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण होते हैं कई-कई सत्रों तक अटके रहते हैं, उस विपक्ष ने भी बिना किसी आपत्ति के सर्वसम्मति से इस बिल पर तुरंत ही मोहर लगा दी।
                   सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा एससी-एसटी एक्ट के संशोधन बिल पास करने के पश्चात पूरे देश के सवर्णों में उबाल की स्थिति बन गई है। सवर्ण समुदाय विरोध को लेकर सड़कों पर उतर आया है। इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सवर्ण अग्रणीय है।


अब राजनीति की पराकाष्ठा देखिए कि एससी-एसटी के नाम पर आज तक सवर्णों को भला बुरा कहते आए दलितों के नेता आज रुख देखकर सवर्णों को गोद लेने के लिए लाइन में खड़े हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती, लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान जो मुख्यतः दलितों के नाम पर राजनीति करते आए हैं, आज उनका कहना है कि आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण की श्रेणी में लाना चाहिए। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने तो यहां तक कह दिया है कि उच्चतम न्यायालय के अनुसार पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो हमें संविधान में संशोधन करके इसको पिचहत्तर प्रतिशत कर देना चाहिए और आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण की श्रेणी में लाना चाहिए।
                  अब सवाल यह उठता है कि अगर पिचहत्तर प्रतिशत आरक्षण कर दिया जाए तो फिर आरक्षण के बाहर बचेगा ही क्या! जरा सोचिए, क्या सच में किसी नेता या राजनीतिक पार्टी को किसी पिछड़े समाज से हमदर्दी है या यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति मात्र है! जहां तक आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण की श्रेणी में लाने के प्रावधान की बात है तो यह तो अभी संभव नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है ना कि आर्थिक पिछड़ापन। 

Friday, September 7, 2018

कानून बदला अब सोच की बारी...

एक तरफ जहां भारतीय संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के तहत नागरिकों के जीने के अधिकार के अंतर्गत निजता का अधिकार प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ सतहत्तर इसकी विरोधाभासी रही है। बृहस्पतिवार को दिए गए अपने फैसले में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करके उच्चतम न्यायालय ने न सिर्फ इस विरोधाभास को समाप्त किया बल्कि देश के एलजीबीटी समुदाय को मौलिक मानवाधिकार दिलाया है। अपने फैंसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यौन प्राथमिकता जैविक और प्राकृतिक है। यह पूर्णता एक निजी चुनाव है। इसमें किसी भी प्रकार का दखल मौलिक अधिकारों का हनन है और धारा तीन सौ सतहत्तर इसका हनन करती है अतः इस को आंशिक रूप से ख़ारिज किया जाता है।



अब प्रश्न यह है कि समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद इसको सामाजिक मान्यता कब तक मिल पाएगी! उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही जहां एक ओर एलजीबीटी कार्यकर्ताओं व समुदाय, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने इसका स्वागत किया वहीं दूसरी ओर धर्म और समाज के कुछ ठेकेदारों को एक बार फिर से चर्चा का एक ज्वलंत मुद्दा मिल गया है। उनका तर्क है कि यह भारतीय समाज के अनुकूल ही नहीं है। 
                भारतीय समाज में अभी भी कुछ लोगों की ऐसी सोच जिंदा है, जो समलैंगिकता को एक बीमारी की तरह सोचते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सभी रेल या बस में जाते हुए दीवारों पर विज्ञापन देखते हैं, जिसमें लिखा होता है, "सेक्स रोगी मिले, सेक्स की हर समस्या का समाधान किया जाता है।"  उसमें समलैंगिकता को भी सेक्स बीमारी के रूप में बताया जाता है। वहीं कुछ लोगों को लगता है कि जो लड़कियां हमेशा लड़कियों के साथ रहती हैं, वह लेस्बियन हो जाती है और जो लड़के अधिकांश्तः हॉस्टल में लड़कों के साथ रहते हैं, वह गे हो जाते हैं।
                दरअसल भारत में शिक्षा का स्तर बहुत कम होने की वजह से इस तरह की सोच संबंधी परेशानियां सामने आती है। यही वजह है कि समाज के नजरिये में जल्दी बदलाव की संभावना क्षीण ही नजर आती है। समलैंगिक संबंधों में कानून संबंधी समस्या के समाप्त होने के बावजूद भी इसको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए समाज में अलग-अलग माध्यमों से जागरूकता फैलाना आवश्यक है। समाज में किसी भी तरह की जागरूकता लाने के लिए सिनेमा एक उचित, शीघ्र और व्यापक माध्यम होता है। उन्नीस सौ अट्ठानवे में दीपा मेहता द्वारा बनाई गई फिल्म "फायर" से लेकर 2016 में आई करण जौहर निर्मित "कपूर एंड संस" तक समलैंगिकता पर भारत में अभी तक लगभग 10 से ज्यादा फिल्में बनाई जा चुकी हैं। भारतीय सिनेमा जगत ने समलैंगिकता के संबंध में जागरूकता फैलाने में पूर्ण तरह से योगदान किया है। बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही फिल्म निर्माता करण जौहर और एक्टर अनिल कपूर द्वारा ट्वीट के ज़रिए दी गई तुरंत प्रतिक्रियायें इसका वर्तमान उदाहरण है।



अंततः सिर्फ कानून बदलने से ही तस्वीर नहीं बदलने वाली सोच को बदलना भी उतना ही जरूरी है।