भारत में हॉकी हमेशा से बहुत प्रिय खेल रहा है।
भारत में हॉकी को पसंद किये जाने की सबसे बड़ी वजह हॉकी खेल के उदय के समय भारतीय
खिलाड़ियों का उत्कृष्ट प्रदर्शन रही है। भारत में हॉकी के प्रति लगाव का अंदाज़ इस
बात से भी लगाया जा सकता है कि आधिकारिक रूप से किसी पुष्टि के बगैर ही हॉकी को एक
लम्बे समय तक भारत का राष्ट्रीय खेल माना जाता रहा।
हॉकी खेल 19वीं सदी में
अंग्रेजी द्धीप में विकसित हुआ था। सर्वप्रथम यह ब्रिटिश विश्वविद्दालयो में खेला
जाता था। भारत में यह ब्रिटिश सेना के द्वारा लाया गया। भारत में सबसे पहले हॉकी
क्लब की स्थापना सत्र 1885-86 में कलकत्ता में हुई थी। अंतराष्ट्रीय
स्तर पर हॉकी की शुरुआत सत्र 1924 में अंतराष्ट्रीय हॉकी महासंघ के गठन
के साथ हुई।
सत्र 1928 में भारतीय
हॉकी टीम अंतराष्ट्रीय हॉकी महासंघ की पहली गैर-यूरोपीय सदस्य टीम बनी। 1928
में ही टीम ने एम्स्टर्डम ओलंपिक में पहली बार भाग लिया और अपने पहले ओलंपिक में
ही पहला स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया जयपाल सिंह की कप्तानी में भारतीय टीम ने इस
ओलंपिक में कुल 5 मैच खेले और पाँचो मैचों में शानदार 29
गोल दागे भारतीय हॉकी टीम की इस अदभुत उपलब्धी के कारण सम्पूर्ण विश्व के खेल जगत
का ध्यान भारतीय हॉकी टीम की ओर आकर्षित हो गया।
पहले ओलंपिक में टीम का प्रदर्शन इस प्रकार
रहा:
पहले मैच में भारत ने ऑस्ट्रिया को 6-0 से
शिकस्त दी। (ध्यानचंद 4, शौकत अली 1, मौरिस 1
)
दूसरे मैच में भारत ने बेल्जियम को 9-0 से
हराया।(फ़िरोज़ खान 5, फेड्रिक सीमैन 2, जॉर्ज मार्थिनस 1,
ध्यानचंद
1)
तीसरे मैच में भारत ने डेनमार्क को 5-0 से
मात दी।(ध्यानचंद 4, फेड्रिक सीमैन 1)
चौथे मैच में भारत ने स्विट्ज़रलैंड को 6-0 से
हराया।(ध्यानचंद 3, मौरिस 2, जॉर्ज मार्थिनस 1)
फाइनल मुकाबला भारत ने हॉलैंड के खिलाफ 3-0
से
जीता।(ध्यानचंद 2, जॉर्ज मार्थिनस 1)
इसके बाद भारतीय टीम ने एक लम्बे समय तक पीछे
मुड़के नहीं देखा। सत्र 1928 से लेकर 1956 तक भारतीय हॉकी
टीम नाबाद रही और टीम ने लगातार 6 ओलंपिको में 6 स्वर्ण पदक
जीते। इस काल को भारतीय हॉकी टीम का स्वर्णिम काल कहा जाता है। इस स्वर्णिम काल में
भारतीय टीम ने 24 मैच खेले और सभी 24 मैचों में
शानदार जीत दर्ज की। इन मैचों में भारतीय टीम ने कुल 178 गोल दागे और
सिर्फ 7 गोल छोड़े
भारतीय हॉकी टीम ने सत्र 1928, 1932,
1936, 1948, 1952, और 1956 में तो खिताब जीते ही साथ ही 1964 और
1980 में भी ओलंपिक विजेता बनने में सफल रही। इसके अलावा भारतीय टीम 1960
में रजत पदक विजेता और 1968 व 1972 में कांस्य पदक
विजेता भी रही।
सत्र 1971 में हॉकी विश्व
कप की शुरुआत हुई इसमें भारतीय टीम ने औसत प्रदर्शन किया और तीसरा स्थान दर्ज किया। 1973 में फाइनल मुकाबला हार जाने के कारण उपविजेता बनकर ही संतुष्ट रहना
पड़ा। अन्ततः 1975 में भारतीय टीम विश्वविजेता बनने में सफल रही।
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| 1975 world cup winning team |
भारत को एक चैंपियन टीम बनाने में जिस खिलाडी
का सबसे अहम योगदान रहा था, वो खिलाड़ी थे भारत में खेलो के पितामह
माने जाने वाले मेजर ध्यानचंद जी। अगर मै कहूँ कि भारतीय हॉकी और उसका इतिहास बिना
मेजर ध्यानचंद के अधूरा है तो ये अतिश्योक्ति न होगी। दद्दा के नाम से मशहूर मेजर
ध्यानचंद ने अपनी खेल प्रतिभा से भारतीय हॉकी को दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाया।
उनका काल भारतीय हॉकी का स्वर्णिम काल था।
इस काल में भारतीय टीम से पार पाना आसान नहीं था। मेजर ध्यानचंद को हॉकी का
जादूगर कहा जाता है। उनको हॉकी का जादूगर कहे जाने के पीछे यह कारण था कि उनकी
स्टिक से गेंद ऐसे चिपक जाती थी जैसे किसी लोहे से चुम्बक चिपक जाती है। हॉकी के
जादूगर के खेल का प्रभाव कुछ इस कदर था कि उसके कारण ही न सिर्फ भारतीय हॉकी को
बल्कि सम्पूर्ण भारतीय खेल जगत को एक नया अंतराष्ट्रीय मुकाम हासिल हुआ। भारतीय
खेल जगत के इस सबसे बड़े खिलाडी ने हिटलर तक को अपना फैन बना लिया था। उनको डॉन
ब्रेडमैन और पेले के साथ दुनिया के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में शुमार किया जाता
है। उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण
से सम्मानित किया गया। भारतीय ओलम्पिक संघ ने मेजर ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाडी
घोषित किया था। उनके भारतीय खेल जगत में अमूल्य योगदान के कारण ही उनके जन्मदिवस 29
अगस्त
को भारतीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। फिलहाल ध्यानचंद को भारत रत्न देने
की मांग की जा रही है।
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| Hockey ke jaadugar: Major Dhyanchand |
| Hockey ke jaadugar: Major Dhyanchand |
यूरोप से शुरू हुए इस खेल में वो ऐसा समय था जब
हॉकी को एशियाई देशो का ही खेल माना जाने लगा। एशियाई टीम भारत और पाकिस्तान का इस
खेल में सबसे अधिक वर्चस्व रहा था। लेकिन नब्बे का दशक आते आते हॉकी में ऐस्ट्रो
टर्फ का आगमन हो गया। (यहाँ बताते चले की ऐस्ट्रो टर्फ एक विशेष प्रकार की बनावटी
घास से तैयार किया गया खेल का पिच होता है) ऐस्ट्रो टर्फ के हॉकी में आ जाने से एक
तरह से इस खेल की जैसे तस्वीर ही बदल गयी। जहां एस्ट्रो टर्फ आने से पूर्व नियंत्रण
के साथ क्लासिक हॉकी खेलने वाले खिलाड़ियों और देशों का दबदबा रहता था, वहीं
इसके आने के बाद तेज हॉकी खेले जाने लगी और नियंत्रण के बजाय तेजी से खेलने वाले
खिलाड़ियों तथा देशों का दबदबा बढ़ने लगा। इसी कारण समय बीतने के साथ-साथ कलात्मक
हॉकी खेलने वाले भारतीय खिलाड़ियों की चमक फीकी पड़ने लगी। इससे न सिर्फ यूरोप ने इस
खेल में पुनः अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं, बल्कि दूसरे
महाद्वीपों की टीमों ने भी इस खेल में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। नब्बे के दशक
के बाद तो भारतीय टीम की हालत और भी पतली हो गई। भारतीय टीम चैम्पियन टीम से
फिसड्डी टीम बनकर रह गईं।
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| Astro turf field |
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| classic field |
उसके बाद से भारतीय हॉकी टीम के प्रदर्शन की
बात करे तो निराशा ही ज्यादा मिलती है। उसका हाल कुछ धूप-छाँव जैसा रहा है जिसमे
भी हार की कड़ी धूप अधिक मिलती है और जीत की छाँव कम। 1989 में धनराज पिल्लै ने भारतीय हॉकी टीम ने अपने करियर की शुरुआत
की। उनके कुछ उत्कृष्ट प्रदर्शनो को देखते हुए भारतीय हॉकी प्रेमियों में एक बार
फिर अपने प्रिय खेल के प्रति उत्साह जागृत होने लगा। धनराज पिल्लै एकमात्र ऐसे
खिलाड़ी हैं, जिन्होंने 4 ओलंपिक, 4 विश्वकप और 4 चैंपियंस ट्रॉफी और 4 एशियाई खेलों में भाग लिया है। उन्होंने कुल 339 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले अपने पूरे करियर
में उन्होंने 170 से ज्यादा गोल
दागे लेकिन एक टीम जब तक मिलकर प्रदर्शन ना करें तब तक एक खिलाड़ी के भरोसे जीत
हासिल नहीं की जा सकती। यही एक बड़ी परेशानी रही धनराज पिल्लै के करियर जीवन में।
हालांकि उनकी कप्तानी में खेलते हुए भारतीय हॉकी टीम ने एशियाई खेल 1998 में स्वर्ण पदक जीता और एशिया कप 2003 में जीत हासिल की। उन्होंने बैंकॉक एशियाई
खेल खेलों में सर्वाधिक गोल दागे थे।
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| Dhanraj Pillay |
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| 2003 Asia cup winning team |
2007 में भारतीय हॉकी में एक बार फिर खुशी की लहर दौड़ पड़ी। 2007 एशिया कप में भारत
ने शानदार जीत दर्ज की।
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| 2007 Asia cup winning team |
लेकिन भारतीय हॉकी प्रेमी इस जीत को
ज्यादा दिन तक नहीं मना सके। 2008
में भारतीय हॉकी का वह काला दिन भी
आया जिसमें लगातार छह बार ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता भारतीय टीम ओलंपिक में खेलने
के लिए क्वालीफाई भी ना कर पाई। यह भारतीय टीम का सबसे खराब दौर कहा जाए तो गलत
नहीं होगा।
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| 2008 india hockey team failed to qualify for olympic games |
भारतीय हॉकी टीम के इतिहास में कभी
प्रतिभावान खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं रही। सन 2004 में ऐसे ही एक खिलाड़ी संदीप सिंह ने
अपने हॉकी करियर की शुरुआत की। 2009
में संदीप सिंह को भारतीय हॉकी टीम का
कप्तान नियुक्त किया गया। उनकी कप्तानी में भारत में अजलन शाह कप 2009 का खिताब जीता, यह
भारत की सुल्तान अजलान शाह हॉकी में 13 साल बाद पहली जीत थी। हॉकी में अपनी
विशेष उपलब्धियों के कारण भारत सरकार ने उन्हें सन 2010 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया।
संदीप सिंह के खेल जीवन से प्रभावित
होकर एक फिल्म निर्माता शाद अली ने संदीप सिंह के जीवन पर सूरमा नाम की एक फिल्म
बनाई। इसे 13 जुलाई 2018 को रिलीज किया गया।
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| sandeep singh |
2006 में अपने अंतरराष्ट्रीय हॉकी करियर का शुरुआत करने वाले सरदार सिंह
का नाम हॉकी के प्रमुख खिलाड़ियों में गिना जाता है। 2008 के अजलन शाह
टूर्नामेंट में पहली बार टीम का नेतृत्व कर के देश के सबसे युवा हॉकी कप्तान बने। भारत सरकार ने 2012 में सरदार सिंह को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। सरदार सिंह की
कप्तानी में एशियाई खेल 2014 में भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक हासिल किया।
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| 2014 asian games winning team |
2017 में हुए एशिया कप हॉकी चैंपियनशिप में भारत ने एक बार फिर 10 साल का सूखा खत्म
करके शानदार जीत दर्ज की भारत की। एशिया कप में तीसरी बार जीती। इससे पहले 2003 और 2007 और अब 2017 में भारत ने एशिया
कप अपने नाम किया और एक बार फिर भारत के हॉकी प्रेमियों को एक खुशी का मौका दिया।
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| 2017 Asia cup winning team |
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| 2017 asia cup winning team |
इंडोनेशिया में 18 अगस्त से शुरू हुए
एशियन गेम्स में भारतीय हॉकी टीम ने अभी तक बहुत शानदार प्रदर्शन किया है। कोच हरेंद्र
सिंह की कोचिंग और श्रीजी रविचंद्रन की कप्तानी में भारतीय टीम ने अपने
पहले मुकाबले में इंडोनेशिया को एकतरफा मुकाबले में 17-0 से हराकर बड़ी जीत दर्ज की है। वही पूल बी के अपने दूसरे मैच में हांगकांग को 26-0 से रौंदकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी में
अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। भारत ने इस दौरान अपने सबसे बड़ी जीत के 86 साल पुराने रिकॉर्ड
को तोड़ा है जो उसने अमेरिका को ओलंपिक में 241 से हराया था। भारतीय हॉकी टीम के इस
शानदार प्रदर्शन को देखते हुए भारतीय हॉकी प्रेमियों को 2018 के एशियन गेम्स में
स्वर्ण पदक जीतने की एक बार फिर से आस जग गई है।
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| india vs hongkong in asian games 2018 |
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| india vs indonesia in asian games 2018 |
1980 से लेकर 2018 तक भारतीय हॉकी टीम का ग्राफ चढ़ता उतरता रहा है। कभी भारतीय टीम ने
जीत का स्वाद चखा तो कभी हार के कड़वे स्वाद को भी अनुभव किया। लेकिन इसका विश्लेषण
करें तो जीत का स्वाद से ज्यादा हार के कड़वे अनुभव को स्वीकार करना पड़ा। यह बात
माननीय है कि भारतीय हॉकी टीम में कभी भी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कमी नहीं रही
है लेकिन फिर भी अपना एक स्वर्णिम काल स्थापित करने वाली भारतीय हॉकी टीम के लिए
यह ग्राफ संतोषजनक नहीं हो सकता। आखिर भारतीय हॉकी टीम की ऐसी दुर्दशा क्यों है? यदि
इसका विश्लेषण करें तो हमें भारतीय हॉकी टीम की जो कमजोरियां नजर आती हैं, उनमें एक
सबसे बड़ी कमजोरी पेनल्टी कॉर्नर को गोल में कन्वर्ट ना कर पाने की रही है। हाल ही
के कुछ सालों में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जब भारत ने जीते हुए यात्रा
की ओर जाते हुए मैच अंतिम क्षणों में गोल खाकर हाथ से निकाल दिया है। भारतीय हॉकी
की एक और समस्या रही है, वह अच्छे खिलाड़ियों की उपेक्षा। हॉकी के तेंदुलकर कहे जाने
वाले धनराज पिल्ले हो, जगबीर सिंह या जोगराज सिंह। इन जैसे न जाने कितने ही
प्रतिभाशाली खिलाड़ी हुए हैं जिनकी हॉकी फेडरेशन ने उपेक्षा की है, उन्हें उचित
अवसर प्रदान नहीं किए गए हैं। इसके अलावा अन्य खेलों की ही तरह नेताओं और नौकरशाहों
के दखल के चलते हुए हॉकी का बेड़ा गर्क हुआ है। यदि भारतीय हॉकी टीम को उसका पुराना
मुकाम हासिल करना है तो उसे अपनी कमजोरियों से पार पाना होगा। खासतौर पर अंतिम
क्षणों में शिथिलता को त्याग कर अपना नियंत्रण बनाए रखना होगा। अपनी इन कमजोर
कड़ियों से पार पा कर ही हम हॉकी में अपने सुनहरे इतिहास को दोहरा पाएंगे।
hyperlinks: https://www.thehindu.com/sport/hockey/1928-olympics-indias-first-step-towards-ascending-hockey-throne/article3613550.ece
https://www.culturalindia.net/national-symbols/national-game.html
-Priyank Bishnoi