Wednesday, February 19, 2020

मुद्दे की बात

 मुद्दे की बात…बस ये छोड़कर देश में बाकी सारी बातें हो रहीं हैं. स्टूडेंट सड़कों पर हैं. यूनिवर्सिटीज़ में जबरदस्ती सर्दी की छुट्टियां दी जा रहीं हैं. एग्जाम की डेट आगे बढ़ाई जा रहीं हैं. आपस में मारपीट हो रही है, पूरे जोश के साथ सिर फुटव्वल जारी है. इन सबके बीच क्या कोई ये सोच रहा है कि ये सब क्यों हो रहा है? क्या इस सबके पीछे असली वजह वही है, जो सामने दिख रही है? सीएए और एनआरसी को लेकर जो बवाल देश की यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ, उस चिंगारी की आग पूरे देश में फैल चुकी है. अच्छी बात है स्टूडेंट देश की आवाज बन रहे हैं. पर वो ये कर क्यों रहे हैं? क्या उस एनआरसी को लेकर, जो अभी आया भी नहीं और पता भी नहीं कि उसमें क्या नियम और शर्तें होने वाली है? या उस सीएए को लेकर जिसका अपने देश के नागरिकों से कोई लेना-देना ही नहीं है?
         समझ नहीं आता कि ये कौन सी अंधी दौड़ है, जिसमें ऐसे-ऐसे लोग दौड़ रहे हैं, जिन्हें दौड़ का आधार ही नहीं पता. ये बात उन पब्लिक फिगर्स के लिए है, जो आजकल ट्विटर-ट्विटर खेल रहे हैं और अपने आप को संविधान का रक्षक बता रहे हैं. अंधी दौड़ इसलिए बोल रहा हूं कि जरा इन संविधान के रक्षकों से संविधान में दिए गए मूल अधिकार ही पूछ लो तो पसीने छूट जाएं और बात बता देंगे भीमराव अंबेडकर तक की.
         सवाल ये है कि देश की दो बड़ी यूनिवर्सिटी, जिसने देश को ऐसे बुद्धिजीवी दिए हैं, जो विश्व में भारत का परचम लहरा रहें हैं, क्या उस यूनिवर्सिटीज के छात्रों के पास अब यही सब मुद्दे रह गए हैं आवाज उठाने के लिए? क्यों इस तरह से वह कभी रोजगार की बात को लेकर सड़कों पर नहीं उतरे? क्यों वे सिर्फ अर्थव्यवस्था की गिरती हालत को लेकर सरकार के खिलाफ कैंडल मार्च पर नहीं निकले? सरकार से सीधा सवाल पूछने का इतना ही जज़्बा है तो क्यों कभी सीधा मुद्दा नहीं उठाते?
         ये दोहरापन आखिर क्यों पनप रहा है? एक ही यूनिवर्सिटी से दो तरह के छात्र निकल रहे हैं. एक तो वह जो टू द प्वाइंट बात करके झंडे गाड़ रहे हैं और विश्व पटल पर देश का परचम लहरा रहें हैं और दूसरी तरफ वो, जो मुद्दे की बात छोड़कर बाकी सब चीजों पर बवाल कर रहे हैं और ना तो खुद ही पढ़ रहे हैं, बल्कि दूसरों का भी कीमती समय बर्बाद कर रहें हैं. तो क्या इस दोहरेपन के पीछे सियासी बू नहीं आती? ये तर्क इसलिए क्योंकि स्कूल, विद्यालय और विश्वविद्यालय, सब शिक्षा के मंदिर होते है और मंदिर में किसी के साथ भेदभाव नही होता. लेकिन अगर भेदभाव दिखाई पड़ रहा है तो समझ लीजिए कि मंदिर में गए उस शख्स की नीयत में खोट है.

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