एक तरफ जहां भारतीय संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के तहत नागरिकों के जीने के अधिकार के अंतर्गत निजता का अधिकार प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ सतहत्तर इसकी विरोधाभासी रही है। बृहस्पतिवार को दिए गए अपने फैसले में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करके उच्चतम न्यायालय ने न सिर्फ इस विरोधाभास को समाप्त किया बल्कि देश के एलजीबीटी समुदाय को मौलिक मानवाधिकार दिलाया है। अपने फैंसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यौन प्राथमिकता जैविक और प्राकृतिक है। यह पूर्णता एक निजी चुनाव है। इसमें किसी भी प्रकार का दखल मौलिक अधिकारों का हनन है और धारा तीन सौ सतहत्तर इसका हनन करती है अतः इस को आंशिक रूप से ख़ारिज किया जाता है।
दरअसल भारत में शिक्षा का स्तर बहुत कम होने की वजह से इस तरह की सोच संबंधी परेशानियां सामने आती है। यही वजह है कि समाज के नजरिये में जल्दी बदलाव की संभावना क्षीण ही नजर आती है। समलैंगिक संबंधों में कानून संबंधी समस्या के समाप्त होने के बावजूद भी इसको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए समाज में अलग-अलग माध्यमों से जागरूकता फैलाना आवश्यक है। समाज में किसी भी तरह की जागरूकता लाने के लिए सिनेमा एक उचित, शीघ्र और व्यापक माध्यम होता है। उन्नीस सौ अट्ठानवे में दीपा मेहता द्वारा बनाई गई फिल्म "फायर" से लेकर 2016 में आई करण जौहर निर्मित "कपूर एंड संस" तक समलैंगिकता पर भारत में अभी तक लगभग 10 से ज्यादा फिल्में बनाई जा चुकी हैं। भारतीय सिनेमा जगत ने समलैंगिकता के संबंध में जागरूकता फैलाने में पूर्ण तरह से योगदान किया है। बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही फिल्म निर्माता करण जौहर और एक्टर अनिल कपूर द्वारा ट्वीट के ज़रिए दी गई तुरंत प्रतिक्रियायें इसका वर्तमान उदाहरण है।
अंततः सिर्फ कानून बदलने से ही तस्वीर नहीं बदलने वाली सोच को बदलना भी उतना ही जरूरी है।
अब प्रश्न यह है कि समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद इसको सामाजिक मान्यता कब तक मिल पाएगी! उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही जहां एक ओर एलजीबीटी कार्यकर्ताओं व समुदाय, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने इसका स्वागत किया वहीं दूसरी ओर धर्म और समाज के कुछ ठेकेदारों को एक बार फिर से चर्चा का एक ज्वलंत मुद्दा मिल गया है। उनका तर्क है कि यह भारतीय समाज के अनुकूल ही नहीं है।
भारतीय समाज में अभी भी कुछ लोगों की ऐसी सोच जिंदा है, जो समलैंगिकता को एक बीमारी की तरह सोचते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सभी रेल या बस में जाते हुए दीवारों पर विज्ञापन देखते हैं, जिसमें लिखा होता है, "सेक्स रोगी मिले, सेक्स की हर समस्या का समाधान किया जाता है।" उसमें समलैंगिकता को भी सेक्स बीमारी के रूप में बताया जाता है। वहीं कुछ लोगों को लगता है कि जो लड़कियां हमेशा लड़कियों के साथ रहती हैं, वह लेस्बियन हो जाती है और जो लड़के अधिकांश्तः हॉस्टल में लड़कों के साथ रहते हैं, वह गे हो जाते हैं।दरअसल भारत में शिक्षा का स्तर बहुत कम होने की वजह से इस तरह की सोच संबंधी परेशानियां सामने आती है। यही वजह है कि समाज के नजरिये में जल्दी बदलाव की संभावना क्षीण ही नजर आती है। समलैंगिक संबंधों में कानून संबंधी समस्या के समाप्त होने के बावजूद भी इसको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए समाज में अलग-अलग माध्यमों से जागरूकता फैलाना आवश्यक है। समाज में किसी भी तरह की जागरूकता लाने के लिए सिनेमा एक उचित, शीघ्र और व्यापक माध्यम होता है। उन्नीस सौ अट्ठानवे में दीपा मेहता द्वारा बनाई गई फिल्म "फायर" से लेकर 2016 में आई करण जौहर निर्मित "कपूर एंड संस" तक समलैंगिकता पर भारत में अभी तक लगभग 10 से ज्यादा फिल्में बनाई जा चुकी हैं। भारतीय सिनेमा जगत ने समलैंगिकता के संबंध में जागरूकता फैलाने में पूर्ण तरह से योगदान किया है। बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय का फैसला आते ही फिल्म निर्माता करण जौहर और एक्टर अनिल कपूर द्वारा ट्वीट के ज़रिए दी गई तुरंत प्रतिक्रियायें इसका वर्तमान उदाहरण है।
अंततः सिर्फ कानून बदलने से ही तस्वीर नहीं बदलने वाली सोच को बदलना भी उतना ही जरूरी है।



Explain very well
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