Saturday, September 8, 2018

आरक्षण: जनता से अधिक नेताओं की ज़रुरत



यूँ तो आरक्षण का जन्म पिछड़े वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए हुआ था, पर वर्तमान राजनीति के परिवेश को देख कर लगता है कि आरक्षण का जन्म असल में वोट बैंक और जातिवाद की राजनीति के लिए हुआ था। इसके वर्तमान उदाहरण के तौर पर बीस मार्च को उच्चतम न्यायालय के एससी-एसटी एक्ट में दिए गए फैसले को देख सकते हैं। फैसले के बाद सत्तारूढ़ पार्टी ने बिना किसी देरी के एससी-एसटी एक्ट में तुरंत संशोधन करके संसद में बिल पेश कर दिया। मज़े की बात देखिए कि विपक्ष के विरोध के कारण न जाने कितने ही बिल जो देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण होते हैं कई-कई सत्रों तक अटके रहते हैं, उस विपक्ष ने भी बिना किसी आपत्ति के सर्वसम्मति से इस बिल पर तुरंत ही मोहर लगा दी।
                   सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा एससी-एसटी एक्ट के संशोधन बिल पास करने के पश्चात पूरे देश के सवर्णों में उबाल की स्थिति बन गई है। सवर्ण समुदाय विरोध को लेकर सड़कों पर उतर आया है। इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सवर्ण अग्रणीय है।


अब राजनीति की पराकाष्ठा देखिए कि एससी-एसटी के नाम पर आज तक सवर्णों को भला बुरा कहते आए दलितों के नेता आज रुख देखकर सवर्णों को गोद लेने के लिए लाइन में खड़े हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती, लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान जो मुख्यतः दलितों के नाम पर राजनीति करते आए हैं, आज उनका कहना है कि आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण की श्रेणी में लाना चाहिए। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने तो यहां तक कह दिया है कि उच्चतम न्यायालय के अनुसार पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो हमें संविधान में संशोधन करके इसको पिचहत्तर प्रतिशत कर देना चाहिए और आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण की श्रेणी में लाना चाहिए।
                  अब सवाल यह उठता है कि अगर पिचहत्तर प्रतिशत आरक्षण कर दिया जाए तो फिर आरक्षण के बाहर बचेगा ही क्या! जरा सोचिए, क्या सच में किसी नेता या राजनीतिक पार्टी को किसी पिछड़े समाज से हमदर्दी है या यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति मात्र है! जहां तक आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण की श्रेणी में लाने के प्रावधान की बात है तो यह तो अभी संभव नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है ना कि आर्थिक पिछड़ापन। 

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